इस पूरी कायनात में मेरा वजूद बस इतना है,
अथाह सागर में एक नन्ही सी बून्द का जितना है,
ये सच है, में कितना भी बड़ा बन जाऊं, मेरी बस इतनी ही औकात है,
और जब इतनी ही औकात है, तो मेरे अभिमान और अहम् की तो क्या ही बिसात है.
एक काल्पनिक दुनिया बना ली है मैंने, जिसमें एक खास किरदार निभा रहा हूँ,
सच से आँखे मूँद ली है, बंद आँखों से
सच तो ये है कि खुद के पूरे शरीर पर भी मेरा बस नहीं चलता है,
पर किसी और पर बस ना चलना, कभी कभी मुझे काफी खलता है..
कभी तो कोई आडंबर रच के लोकप्रियता के झंडे गाड़ लेता हूँ,
कभी 4 केले ,एक कंबल बांट के खुद को खुदा मान लेता हूं ,
सच है कि प्रकृति की अनुकम्पा से चलते मेरे सारे काम है,
पर मैं ये मान चलता हूँ की ये प्रकृति तो मेरी ही गुलाम है,
लोभी हूं , कुछ प्रिय सा देख मन भी मचलता है , क्रोधी हूं ,पर जाने क्यों क्रोध कमजोरों पर ही निकलता है ,
आत्म अवलोकन की आवश्यकता को जीवन से हटा देता हूँ,
पर औरों का अवलोकन कर उनके चरित्र की सारी कमियां बता देता हूँ,
कुछ अच्छा है तो मैंने किया है, कुछ बुरा है तो कोई और ही गुनाहगार है,
शायद मेरा ये अहम् ही रावण और कंस का कलयुगी विस्तार है..
सीमा तो इसकी भी होगी, एक दिन नियति भी फल देगी,
मेरे कल्पित कोमल गालों पर सच का थप्पड़ जड़ देगी,
जीवन की क्षण भंगुरता से जब मेरा परिचय होगा,
खुद को बौना मानूंगा , प्रकृति का जय जय होगा...
अहम् को फिर में त्यागूंगा, ईश्वर में मेरा विलय होगा,
तब अस्तित्व मेरा बौना ही सही, लेकिन गरिमामय होगा, लेकिन गरिमामय होगा.....
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