Add*/दस दस लोगों जितनी बुद्धि ,पर दूषित था मन ,
मन के मारे कर ना पाया , नीर –क्षीर चिंतन ।
हरण सिया का कर बैठा वो ,तनिक ना आई शर्म ।
सेना भी थी , ताकत भी थी , ओत प्रोत था ज्ञान से ,
बस ज्ञात नही था उसको कि वह उलझ रहा प्रभु राम से ।
राम ने आखिर किया धराशय टी007 के अभिमान को ,
नमन राम को ,नमन लखन को और वीर हनुमान को ।
\l###/हर वर्ष दशहरा आता, रावण धूं धूं कर के जलता है ,
पर हर युग में वह बन प्रासंगिक, राम के मन को खलता है
आज समय में खड़ा चौराहे , पर स्त्री जो ताके है,
गौर से देखो तो रावण, उसके अंदर से झांकें है ।
धन , दौलत , ताकत , वैभव का जिसको भी अभिमान है ,
बन बैठा वो उस रावण की, मुंह बोली संतान है ।
जो बात बात पर क्रोधित हो कर, बनते अत्याचारी है ,
सच कह दूं रावण कहलाने, के सच्चे अधिकारी है ।
क्रोध , कुदृष्टि , अहंकार और दुराचार के वाहन को ,
एक एक कर अपने मन में खोजो, दहन करो इस रावण को ,
3इज़्ज़ग जैसीsá केजोए aa z ZZ ZZ zz aa aa pp