जनता/जनप्रतिनिधि का नज़रिया :-
तू भ्रष्ट है , निकृष्ट है , मेरे सृजन हेतु खुद नष्ट है ..
गुणहीन स्वयं को मान लिया,
मेरे गुण गाने में व्यस्त है ,
तुझे खुद के लिये मिले समय नहीं,
पर मेरे लिये उपलब्ध है,
यहाँ आने के पहले था ज्ञान बहुत,
यहाँ बन बैठा अल्पज्ञ है ,
खुद के दम पे पाया तूने ,
पर मेरे प्रति कृतज्ञ है ,
कारण के बिना हुआ अपमानित ,
इस हेतु भी अभ्यस्त है,
कण कण कर खुद को जोड़े रोज़,
फिर हो जाता खुद ध्वस्त है,
तू भ्रष्ट है , निकृष्ट है , मेरे सृजन हेतु खुद नष्ट है ..
तू भ्रष्ट है , निकृष्ट है , मेरे सृजन हेतु खुद नष्ट है .....
अधिकारी/कर्मचारी का मन :-
उत्कृष्ट हूँ, नहीं भ्रष्ट हूँ, भ्रष्टों के लिये एक कष्ट हूँ..
उत्कृष्ट हूँ, नहीं भ्रष्ट हूँ, भ्रष्टों के लिये एक कष्ट हूँ...
सच सुनने का साहस जिनमे,
मैं उनके प्रति विश्वस्त हूँ,
जिनके चश्मे पर धूल नहीं,
वो देखें मुझे, स्पष्ट हूँ,
कई राह खड़े भौंकें मुझपर,
पथ पर अपने मदमस्त हूँ,
नियत से नियति तय होती,
मैं खुद खुद का प्रारब्ध हूँ,
तू राम कहे तो विस्तृत हूँ,
रावण जो कहे संक्षिप्त हूँ.
मैं धीर हूँ, गंभीर हूँ, मैं चलूँ अथक,राहगीर हूँ,
है करुणा भी, निश्छलता भी, मिनाक्ष पे लगता तीर हूँ,
रुकता,थमता,ना जड़ होता , सतपथ पर बहता नीर हूँ,
जो जुड़ जाये, उसे छोडूं नहीं, हाँ पाश हूँ, जंजीर हूँ,
हूँ श्याम भी मैं, मैं श्वेत भी हूँ, हर रंग भरी तस्वीर हूँ,
हो शांत जगत तो कलम हूँ मैं, रणभूमि तो शमशीर हूँ,
स्पष्ट हूँ, निष्पक्ष हूँ, विश्वस्त हूँ, उपलब्ध हूँ, उन्मुक्त हूँ, मैं व्यस्त हूँ, मदमस्त हूँ..... उत्कृष्ट हूँ...
बहुत शानदार तरीके से आपने अधिकारी, कर्मचारी की मनोदशा का वर्णन किया हैं भैया 👌👌👌
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद, शुभांकिनी 😊
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