क्या लिखूं, मैं उस कयामत पर..?
क्या लिखूं, क्या लिखूं,
क्या लिखूं, मैं उस कयामत पर..?
उसकी झील सी गहरी आँखों पर,
या आँखों में बसी उस शराफत पर,
उसके फूलों से प्यारे होठों पर,
या होठों पे सजी मुस्कुराहट पर,
लड़खड़ाते, बालखाते क़दमों पर,
या मेरे पास आती उसकी आहट पर,
उसकी लहराती गहराती ज़ुल्फ़ों पर,
या उन्हें छू लेने की मेरी चाहत पर...
क्या लिखूं, क्या लिखूं,
क्या लिखूं, मैं उस कयामत पर..?
क्या लिखूं, क्या लिखूं,
क्या लिखूं, मैं उस कयामत पर..?
चुप रहने से छाती उस ख़ामोशी पर,
या कह के जो करे उस शरारत पर,
तुझे मुझ से मिलाने वाले खुदा पर,
या मुझ पे उसने जो की है उस इनायत पर..
बड़ी बड़ी उसकी क़ुरबानी पर,
या छोटी छोटी सी शिकायत पर..
गुस्से में जो करे, उन हिसाबों पर,
या बेहिसाबी से करी उस मोहब्बत पर...
क्या लिखूं, क्या लिखूं,
क्या लिखूं, मैं उस कयामत पर..?
क्या लिखूं, क्या लिखूं,
क्या लिखूं, मैं उस कयामत पर..?
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